नांदेड़ (प्रतिनिधि)- नांदेड़ में गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर साहिब अबचलनगर के संचालन के लिए वर्ष 2014 में दी गई नई कानून रिपोर्ट अब स्वीकार किए जाने की संभावना है। लेकिन इस रिपोर्ट की समालोचन यह है कि इस बोर्ड की शक्ति स्थानीय सिख समुदाय को छोड़कर अन्य लोगों के हाथों में जानेवाली है। 300 से अधिक वर्षों से, गुरुद्वारे का प्रबंधन नांदेड़ के सिख भाइयों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी किया जाता रहा है। इस रिपोर्ट का मजमून ये है कि अब राज्य सरकार इसी से चलायेगी। धार्मिक संस्थाओं पर कब्ज़ा करने का यह सरकार का नया खेल है।
300 वर्ष पूर्व दशमपातशाह गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज के आगमनने नांदेड़ की भूमि को पवित्र किया। बहुत ही छोटी सी जगह में गुरुद्वारा बनाया गया। कुछ पुरानी तस्वीरें उपलब्ध हैं। इसमें सिर्फ ईंटों का निर्माण ही नजर आता है। उसने बाहर से प्लास्टर भी नहीं किया था। गुरु महाराज के साथ कुछ सिख पंजाब से यहॉं आये थे। इन्हें हजूरी सिख कहा जाता है। गुरु महाराज ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को अपने बाद गुरु की उपाधि दी। तब से, गुरुद्वारा को धीरे-धीरे कई राजा महाराजाओं द्वारा दिए गए धन सेवा से विकसित किया गया है और दृश्यमान भव्यता नांदेड़कर सिख समुदाय की 300 से अधिक वर्षों की कड़ी मेहनत का परिणाम है।
इसके अलावा गुरुद्वारा अधिनियम होना चाहिए ऐसी बात चली। उस समय मराठवाड़ा क्षेत्र पर निज़ाम का शासन था। उस समय नांदेड़ सिख गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर अबचलनगर साहिब अधिनियम 1956 अधिनियमित किया गया और उस अधिनियम के तहत नांदेड़ गुरुद्वारे के प्रबंधन के लिए एक बोर्ड की स्थापना की गई। आज तक सब कुछ ऐसे ही चलता रहा। साल 2008 में सरकार ने अचानक गुरुद्वारा बोर्ड पर प्रशासक नियुक्त कर गुरु-ता-गद्दी कार्यक्रम शुरू कर दिया। इस आयोजन के लिए फंडिंग बहुत बड़ी थी। लेकिन उस कार्यक्रम के लिए धन मिलने के बाद, राजनीतिक नेताओं ने यह दावा करके कि यह मैंने किया है, मूल काम करने वालों को किनारे कर दिया। उस समय मोंटेकसिंह अहलूवालिया भारत के योजना मंत्री थे और उनकी पहल के बाद ही उस कार्यक्रम के लिए 2.5 हजार करोड़ रुपये का फंड दिया गया था। आज जो सिख भाई 65 वर्ष से अधिक उम्र के हैं। इस काम के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की है। हमने ये इसलिए बताया है क्योंकि हमें सभी के नाम याद नहीं होंगे। इसके बाद, प्रशासनिक नियुक्ति करणे के लिऐ अधिनियम, 1956 की धारा 11 में संशोधन का मुद्दा सामने आया और 2014 में, महाराष्ट्र सरकार ने अधिनियम में संशोधन करने के लिए तीन सदस्यीय समिति नियुक्त की। इसके प्रमुख सेवानिवृत्त न्यायाधीश जे.एच. भाटिया थे। उन्होंने 8 अगस्त 2014 को तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस भाटिया कमेटी को 3 महीने का समय दिया गया था। किसी कानून को बदलना 3 महीने में करने जैसा है क्या। इस मौके पर नांदेड़ के सरदार राजेंद्रसिंघ शाहू ने यह सवाल उठाया. सरदार जगदीप सिंघ नंबरदार को सूचना के अधिकार पर भाटिया समिति की रिपोर्ट प्राप्त हुई।
भाटिया समिति की रिपोर्ट में पांच कानूनों का उल्लेख किया गया है, जैसे नांदेड़ गुरुद्वारा अधिनियम 1956, सिख गुरुद्वारा अधिनियम 1925, दिल्ली सिख गुरुद्वारा अधिनियम 1971, जम्मू और कश्मीर सिख गुरुद्वारा और धार्मिक अधिनियम 1973, संविधान और उपनियम तख्त हरमिंदर साहिब, पटना साहिब है। साथ ही इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लोग ऐसी राय रखते हैं। लेकिन इस एक्ट में इसका कोई सबूत नहीं है। आज गुरुद्वारा बोर्ड नांदेड़ के प्रशासक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी डॉ. विजय सतबीरसिंघ हैं। वे इस भाटिया समिति के सदस्य भी थे। अन्य दो सदस्य गैर-सिख हैं। अब मुख्य मुद्दा सिर्फ 1956 के अधिनियम की धारा 11 में संशोधन है, महाराष्ट्र ने प्रशासक नियुक्त करने का अधिकार अपने हाथ में ले लिया है और उसके अनुसार काम शुरू हो गया है। नांदेड़ सिख समुदाय में उनका काफी विरोध हुआ और इसी वजह से महाराष्ट्र सरकारने कानून में ही बदलाव करने की तैयारी कर ली। इस कमेटी ने नये कानून को तख्त सचखंड श्री हजूर अबचलनगर साहिब गुरुद्वारा एक्ट नाम दिया।
इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि नांदेड़ जिले में सिखों की संख्या 15 हजार, औरंगाबाद 5 हजार, मुंबई 1 लाख 50 हजार, ठाणे और नवी मुंबई-75 हजार, पुणे 50 हजार, नागपुर 50 हजार और नासिक 15 हजार लिखा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नांदेड़ में सिख समुदाय के छोटे आकार और कम शिक्षा के कारण गुरुद्वारे का प्रबंधन करना मुश्किल हो गया है। लेकिन आज नांदेड़ के सिख भाई गुरु महाराज द्वारा कहे गए वाक्य “मानस की जात एकहि पहचान बो’ का पालन करते हुए 300 वर्षों से इस गुरुद्वारे का प्रबंधन कर रहे हैं। यह प्रबंधन सभी धर्मावलंबियों को साथ लेकर आगे बढ़ा है। इसमें गुरुद्वारा बोर्ड के स्कूल हैं, पॉलिटेक्नीक कॉलेज, हॉस्टेल, शहर में एक मेडिकल कॉलेज को दिए गए स्थान के कारण मेडिकल कॉलेज का नाम भी श्री गुरु गोविंदसिंघजी सरकारी अस्पताल है। नांदेड़ में कई सिख छात्रों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की है और बडे-बडे पद प्राप्त किए हैं और इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि वर्ष 2014 में शिक्षा की कमी थी। जिस वर्ष यह रिपोर्ट तैयार की गई थी। सरदार राजेंद्रसिंघ शाहू ने व्यक्त किया की, नांदेड़ के सिख भाइयों के लिए किसी भी अन्य स्थान के गुरुद्वारा प्रशासन में कोई जगह नहीं है। राजेंद्रसिंघ शाहू ने सवाल उठाया ‘नांदेड़ के गुरुद्वारा बोर्ड के प्रशासन में अन्य स्थानों के सिख भाइयों की आवश्यकता है क्या?’ राजेंद्रसिंघ शाहुने दशमपातशाह कें शब्दोको याद करते हुये कहा की, “सवा लखसे एक लढाऊं तो गोविंदसिंघ नाम कहाऊं’। अगर हम गुरु महाराज के इसप्रकार के सेवक है तो हमे कोई दुसरे स्थान कें सिख भाईयों के मदत की आवश्यकता नहीं है ऐसा राजेंद्रसिंघ शाहुने बताया।
नये अधिनियम में कुल सदस्यों की संख्या 21 दर्शायी गयी है। जिसमें 18 लोग होंगे जो निर्वाचित किये जायेंगे । उन 18 में से 10 लोग ऐसे है जो नांदेड जिल्हे के होंगे जिसमे 9 नागरीक नांदेड़ जिले से और 1 गुरुद्वारा में सेवा देने वालो में से होगा। औरंगाबाद जिले से 1 सदस्य, मुंबई और मुंबई उपनगरों से 3 सदस्य, पुणे जिले से 1 सदस्य, नासिक जिले से 1 सदस्य, नागपुर जिले से 1 सदस्य, 1 सदस्य की नियुक्ति गुरुद्वारा बोर्ड के अध्यक्ष द्वारा की जाएगी जो उन सिखों में से चुना जाएगा जिन जिलो के नाम उपर नही लिखे है। इसके अलावा 1 सदस्य शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अमृतसर की ओर से और 2 सदस्य सरकार महाराष्ट्र सरकारद्वारा नियुक्त किए जाएंगे। गुरुद्वारा बोर्ड के चुनाव के लिए संभागीय आयुक्त काम करेंगे। पहली बैठक चुनाव के 1 महीने के भीतर बुलाई जा सकती है। बोर्ड का विहित कार्यकाल समाप्त होने के 6 महीने के भीतर नये बोर्ड का चुनाव किया जाएगा। बोर्ड के 6 सदस्यों के खिलाफ जिला जज निलंबन की कार्यवाही कर सकते हैं। जिनपर परिसंपत्तियों की गलत प्रबंधन पद्धति का आरोप किया गया है। अगर ऐसे आरोप लगे तो पुर्ण बोर्ड भंग कर दिया जायेगा। बोर्ड के विघटन के बाद किसी भी सिख व्यक्ति को सरकार बोर्ड पर प्रशासन करने के लिऐ नियुक्त कर सकती है। इसमें लिखा गया है कि न तो सरकारी अधिकारी और न ही सरकार बोर्ड के काम या संपत्ति में कोई हिस्सा लेंगे। यदि कोई व्यक्ति बोर्ड के किसी निर्णय के विरुद्ध आवेदन दायर करता है तो कलेक्टर उस निर्णय पर रोक लगा सकता है। इसके बाद महाराष्ट्र सरकार के पास जिला कलेक्टर द्वारा दिए गए फैसले को बदलने का अधिकार होगा। केवल केशधारी सिख ही गुरुद्वारा बोर्ड के सदस्य होंगे। सदस्य बनने के लिए कम से कम 12वीं पास होने का प्रमाणपत्र आवश्यक है और गुरुद्वारा बोर्ड के कार्यालय में काम करने वालों के पास डिग्री होनी चाहिए। दो साल की सजा पाए व्यक्ति को गुरुद्वारा बोर्ड में नौकरी नहीं मिलेगी। यहा पर पिछे ऐसा देखा गया की, नांदेड के एक अपर जिलाधिकारी ने आपने पिताजी के नाम पर दरबार के सामने एक पार्क बनवाया था।
इस संक्षिप्त प्रस्तुति में हमने नये कानून की जानकारी दी है। लेकिन सवाल है कि क्या स्थानीय सिखों को अध्यक्ष पद मिलेगा या नहीं। सिख धर्म को माननेवाली मंडली में सिंधी भाई, लमानी भाई, शिकलगर भाई है। बोर्ड चुनाव में इनका नाम मतदाता के रूप में आयेगा, इसका कोई उल्लेख नहीं है। यदि अन्य स्थानों से सदस्य गुरुद्वारा बोर्ड बैठक के लिए नांदेड़ आएंगे तो खर्चा बढ़ जाएगा। अन्य स्थानों के स्थानीय गुरुद्वारों की समस्याएँ क्या हैं, और नांदेड की क्या है इसका सटीक अनुमान लगाने में नये सदस्य सक्षम नहीं हो सकते हैं। स्थानीय सिख और अन्य स्थानों के सिख कुछ अलग अलग परंपराओं का पालन करते हैं, इसलिए इससे विवाद भी बढ़ेगा। अगर नया कानून अस्तित्व में नहीं आया तो गुरुद्वारा बोर्ड सरकार के अधीन ही रहेगा। वास्तव में, यह अधिनियम 1956 का है। अगर वह बदलना चाहता है तो सरकार को स्थानीय लोगों पर भरोसा करना होगा। जनसंख्या के आधार पर कम या ज्यादा जैसी कोई बात नहीं है। नांदेड की सिख मंडली और उनके वंशज जो 3 शताब्दियों से अधिक समय से गुरुद्वारा बोर्ड का प्रबंधन कर रहे हैं, अभी भी ऐसा करने में सक्षम हैं। गुरुद्वारा को नांदेड़ में गुरू सेवा के दौरान कई प्रथाओं का अन्य स्थानों के सिख भाईयों द्वारा विरोध किया जाता है। तो यदि अन्य स्थानों से नये बोर्ड में नये लोग आयेंगे तो क्या वह लोग नांदेड गुरुद्वारा के कार्य मे हस्तक्षेप नही करेंगे? इस रिपोर्ट में इसबात का कोई जवाब नहीं है।
सरकार को एक बार फिर से भाटिया कमेटी की रिपोर्ट को स्वीकार करने से पहिले , पुराने कानून को निरस्त करने से पहिले या नया कानून बनाने से पहिले एक नया विचार करना जरूरी है। गुरुद्वारा बोर्ड के चुनाव में देरी को लेकर सरदार जगदीप सिंघ नंबरदार ने हाईकोर्ट औरंगाबाद बेंच में अदालत की अवमानना याचिका दायर की है। जिसके जवाब में, सरकार ने माफी मांगी और यह कहकर समय को टाल दिया की, एक नया कानून तैयार किया जा रहा है। इसलिए महाराष्ट्र सरकार भाटिया कमेटी द्वारा दिए गए कानून को बरकरार रखने की जल्दी में है। लेकिन यह सुनिश्चित करना भी महाराष्ट्र सरकार का काम है कि इस जल्दबाजी से अशांति न फैले।
गुरुद्वारा बोर्ड के लिए नया कानून गुरुद्वारा बोर्ड को अपने नियंत्रण में रखने की सरकार की एक चाल है?